BAHL BAHL 102 Question Paper 2026 | Hindi Katha Sahitya Solved Paper

BAHL N 102 Solved Paper 2026 – इस पोस्ट में उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय (UOU) के हिन्दी कथा साहित्य विषय के प्रश्नपत्र के सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों के विस्तृत उत्तर दिए गए हैं। विद्यार्थियों के लिए यह BAHL N 102 Solved Paper 2026 परीक्षा की तैयारी में उपयोगी है। 📚✍

BAHL 102 Question Paper 2026 हिन्दी कथा साहित्य का महत्वपूर्ण प्रश्न पत्र है। यहाँ BAHL 102 के प्रश्न, उत्तर, महत्वपूर्ण प्रश्न और परीक्षा से जुड़ी जानकारी प्राप्त करें।️

Table of Contents

🔴 खण्ड–क : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. द्विवेदी युग के सन्दर्भ में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की भूमिका का विवेचन कीजिए। 🌟

भूमिका

हिन्दी साहित्य के इतिहास में द्विवेदी युग का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी साहित्य में आधुनिक चेतना, राष्ट्रीय भावना, सामाजिक सुधार तथा भाषा के परिष्कार को विकसित करने में इस युग का विशेष योगदान रहा। इस युग का नाम महान साहित्यकार एवं संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर पड़ा। सामान्यतः हिन्दी साहित्य के इतिहास में सन् 1900 से 1920 के आसपास के काल को द्विवेदी युग कहा जाता है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी केवल साहित्यकार ही नहीं थे, बल्कि वे संपादक, आलोचक, भाषा-सुधारक, निबंधकार और साहित्यिक मार्गदर्शक भी थे। उन्होंने हिन्दी साहित्य को एक निश्चित दिशा प्रदान की। 🖋️

1. द्विवेदी युग की पृष्ठभूमि

भारत उस समय अंग्रेजी शासन के अधीन था। देश में सामाजिक कुरीतियाँ, अशिक्षा, जातिगत भेदभाव, स्त्री-अशिक्षा तथा आर्थिक शोषण जैसी अनेक समस्याएँ थीं। दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना भी धीरे-धीरे विकसित हो रही थी।

ऐसे समय में साहित्यकारों के सामने यह चुनौती थी कि साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन न बनाकर उसे समाज और राष्ट्र के निर्माण का माध्यम बनाया जाए। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसी दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। 🇮🇳

2. ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन 📖

महावीर प्रसाद द्विवेदी की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन प्रमुख है। उन्होंने ‘सरस्वती’ के माध्यम से हिन्दी साहित्य को नई दिशा दी।

उनके संपादन में ‘सरस्वती’ केवल साहित्यिक पत्रिका नहीं रही, बल्कि वह सामाजिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय और साहित्यिक जागरण का मंच बन गई।

उन्होंने अनेक नए लेखकों एवं कवियों को प्रोत्साहित किया तथा हिन्दी में स्वस्थ साहित्यिक वातावरण का निर्माण किया।

3. हिन्दी भाषा का परिष्कार ✍️

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी भाषा को व्यवस्थित और परिष्कृत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उनके समय में हिन्दी में अनेक प्रकार की भाषागत अशुद्धियाँ तथा अनावश्यक शब्द-प्रयोग पाए जाते थे। द्विवेदी जी ने—

  • व्याकरण की शुद्धता पर बल दिया।
  • वाक्य-विन्यास को व्यवस्थित किया।
  • खड़ी बोली हिन्दी को प्रतिष्ठित किया।
  • भाषा को सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली बनाने का प्रयास किया।
  • साहित्यिक हिन्दी को एक निश्चित स्वरूप प्रदान किया।

इस प्रकार उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी के विकास और प्रतिष्ठा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

4. साहित्य को सामाजिक उद्देश्य प्रदान करना 👥

द्विवेदी जी साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं मानते थे। उनके लिए साहित्य का उद्देश्य समाज का सुधार और जन-जागरण भी था।

उन्होंने बाल-विवाह, अशिक्षा, सामाजिक रूढ़ियों, अंधविश्वास तथा अन्य कुरीतियों के विरुद्ध लेखन को प्रोत्साहित किया।

उनकी दृष्टि में साहित्यकार का दायित्व समाज के प्रति भी होता है। इसलिए द्विवेदी युग का साहित्य सुधारवादी और उपयोगितावादी दृष्टिकोण से प्रभावित दिखाई देता है।

5. राष्ट्रीय भावना का विकास 🇮🇳

द्विवेदी युग में राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य के माध्यम से लोगों में देशप्रेम और स्वाभिमान की भावना उत्पन्न करने का प्रयास किया।

उनके संपादन और मार्गदर्शन में प्रकाशित साहित्य में भारतीय संस्कृति, देशभक्ति और सामाजिक जागरण की भावना दिखाई देती है।

इस प्रकार साहित्य को राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना से जोड़ने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

6. नए साहित्यकारों को प्रोत्साहन 🌱

द्विवेदी जी स्वयं अच्छे लेखक होने के साथ-साथ प्रतिभाओं के पहचानकर्ता और मार्गदर्शक भी थे।

उन्होंने अनेक साहित्यकारों को आगे बढ़ने का अवसर दिया। विशेष रूप से मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवियों के साहित्यिक विकास में उनका मार्गदर्शन महत्वपूर्ण माना जाता है।

उन्होंने साहित्यकारों को भाषा की शुद्धता, विषय की गंभीरता और सामाजिक उपयोगिता की ओर प्रेरित किया।

7. आलोचना के क्षेत्र में योगदान

द्विवेदी जी ने हिन्दी में आलोचनात्मक दृष्टि के विकास में भी योगदान दिया। वे साहित्य में विचार, भाषा, उद्देश्य और सामाजिक उपयोगिता को महत्व देते थे।

उन्होंने साहित्य की कमजोरियों की ओर ध्यान आकर्षित किया और लेखकों को बेहतर लेखन के लिए प्रेरित किया।

8. गद्य साहित्य का विकास 📚

द्विवेदी युग में हिन्दी गद्य का भी तेजी से विकास हुआ। निबंध, आलोचना, कहानी, उपन्यास तथा अन्य गद्य-विधाओं के विकास के लिए वातावरण तैयार हुआ।

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने गद्य को—

सरल + स्पष्ट + तार्किक + उद्देश्यपूर्ण

बनाने पर बल दिया।

9. स्त्री शिक्षा और सामाजिक सुधार

द्विवेदी जी सामाजिक सुधार के समर्थक थे। उन्होंने स्त्री शिक्षा, शिक्षा के प्रसार और समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने की आवश्यकता पर बल दिया।

उनके समय के साहित्य में सामाजिक समस्याओं को विषय बनाया जाना इसी सुधारवादी दृष्टिकोण का परिणाम था।

10. साहित्यिक अनुशासन

द्विवेदी जी साहित्य में अनुशासन और मर्यादा के पक्षधर थे। वे भाषा की शुद्धता, विचारों की गंभीरता तथा साहित्य के सामाजिक उद्देश्य को विशेष महत्व देते थे।

इसी कारण द्विवेदी युग का साहित्य अपेक्षाकृत अधिक व्यवस्थित, शिक्षाप्रद और उद्देश्यपूर्ण दिखाई देता है।

निष्कर्ष 🌺

अंततः कहा जा सकता है कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी साहित्य के युग-निर्माता साहित्यकार थे। उन्होंने हिन्दी भाषा को परिष्कृत करने, खड़ी बोली को प्रतिष्ठित करने, ‘सरस्वती’ के माध्यम से साहित्यिक जागरण करने, नए साहित्यकारों को प्रोत्साहित करने तथा साहित्य में राष्ट्रीय एवं सामाजिक चेतना विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनके प्रयासों से हिन्दी साहित्य ने आधुनिकता की ओर निर्णायक कदम बढ़ाया। इसलिए द्विवेदी जी को हिन्दी साहित्य के आधुनिक विकास का प्रमुख मार्गदर्शक और युग-प्रवर्तक कहना उचित है। 🌟📖


प्रश्न 2. हिन्दी उपन्यास के तत्वों पर प्रकाश डालिए। 📚

भूमिका

उपन्यास हिन्दी गद्य साहित्य की एक अत्यंत लोकप्रिय और महत्वपूर्ण विधा है। इसमें मानव जीवन, समाज, परिवार, व्यक्ति के संघर्ष तथा विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का विस्तृत और यथार्थ चित्रण किया जाता है।

‘उपन्यास’ का सामान्य अर्थ है—ऐसी विस्तृत गद्य-कथा जिसमें जीवन के अनेक पक्षों, घटनाओं और पात्रों का क्रमबद्ध चित्रण किया जाता है।

एक सफल उपन्यास केवल घटनाओं का संग्रह नहीं होता, बल्कि उसमें कुछ आवश्यक तत्वों का संतुलित रूप से होना जरूरी है। इन्हीं को उपन्यास के तत्व कहा जाता है।


हिन्दी उपन्यास के प्रमुख तत्व 🌟

1. कथावस्तु / कथानक 📖

उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण तत्व कथानक है। कथानक से आशय उन घटनाओं के क्रम से है जिनके माध्यम से उपन्यास की कहानी आगे बढ़ती है।

एक अच्छे कथानक में—

  • घटनाओं में क्रमबद्धता होनी चाहिए।
  • घटनाएँ एक-दूसरे से जुड़ी होनी चाहिए।
  • अनावश्यक घटनाओं से बचना चाहिए।
  • कथा में रोचकता और स्वाभाविकता होनी चाहिए।
  • घटनाओं का विकास तार्किक होना चाहिए।

उपन्यास का कथानक जितना सुसंगठित होगा, उपन्यास उतना ही प्रभावशाली बनेगा।


2. पात्र एवं चरित्र-चित्रण 👤

उपन्यास में पात्रों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है। पात्रों के माध्यम से ही लेखक अपने विचारों और जीवन-दृष्टि को व्यक्त करता है।

उपन्यास में—

  • मुख्य पात्र
  • सहायक पात्र
  • विरोधी पात्र
  • सामाजिक पात्र

आदि हो सकते हैं।

अच्छे चरित्र-चित्रण में पात्रों के स्वभाव, विचार, व्यवहार, भावनाओं और संघर्षों का स्वाभाविक चित्रण किया जाता है।

पात्र केवल कहानी को आगे बढ़ाने वाले साधन नहीं होते, बल्कि वे जीवन का प्रतिनिधित्व भी करते हैं।


3. संवाद 🗣️

उपन्यास में पात्रों द्वारा एक-दूसरे से की गई बातचीत को संवाद कहा जाता है।

संवाद के माध्यम से—

  • पात्रों का स्वभाव स्पष्ट होता है।
  • कथा आगे बढ़ती है।
  • घटनाएँ अधिक स्वाभाविक लगती हैं।
  • पाठक की रुचि बनी रहती है।
  • लेखक अपने विचारों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रस्तुत कर सकता है।

अच्छे संवाद स्वाभाविक, संक्षिप्त, पात्रानुकूल और प्रभावशाली होने चाहिए।


4. देशकाल और वातावरण 🌳

उपन्यास में जिस समय और स्थान में घटनाएँ घटित होती हैं, उसे देशकाल कहा जाता है। इसके साथ उस स्थान की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियाँ वातावरण का निर्माण करती हैं।

उदाहरण के लिए ग्रामीण जीवन पर आधारित उपन्यास में गाँव का वातावरण, वहाँ की भाषा, रहन-सहन, परंपराएँ और आर्थिक स्थिति का चित्रण आवश्यक होता है।

देशकाल और वातावरण कथा को विश्वसनीय और यथार्थपूर्ण बनाते हैं।


5. भाषा और शैली ✍️

उपन्यास की भाषा उसके प्रभाव को बहुत अधिक प्रभावित करती है।

उपन्यास की भाषा—

  • सरल
  • सहज
  • स्वाभाविक
  • पात्रानुकूल
  • प्रभावशाली

होनी चाहिए।

यदि ग्रामीण पात्र है तो उसकी भाषा में ग्रामीणता का प्रभाव दिखाई देना स्वाभाविक है। इसी प्रकार शिक्षित या उच्च वर्ग के पात्र की भाषा अलग हो सकती है।

उपन्यासकार अपनी आवश्यकता के अनुसार वर्णनात्मक, संवादात्मक, मनोवैज्ञानिक, व्यंग्यात्मक या भावात्मक शैली का प्रयोग कर सकता है।


6. उद्देश्य 🎯

हर अच्छे उपन्यास के पीछे कोई न कोई उद्देश्य होता है। उपन्यासकार समाज, व्यक्ति या जीवन के किसी पक्ष को पाठकों के सामने प्रस्तुत करता है।

उपन्यास के उद्देश्य हो सकते हैं—

  • सामाजिक सुधार
  • राष्ट्रीय चेतना
  • मानवीय मूल्यों की स्थापना
  • सामाजिक समस्याओं का चित्रण
  • मनोरंजन
  • जीवन की वास्तविकताओं को सामने लाना
  • व्यक्ति और समाज के संबंधों को समझाना।

इसलिए उपन्यास में मनोरंजन के साथ-साथ जीवन-दृष्टि भी दिखाई देती है।


7. संघर्ष ⚔️

कथा में संघर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। संघर्ष के कारण कथा में गति और रोचकता आती है।

संघर्ष कई प्रकार का हो सकता है—

  • व्यक्ति बनाम व्यक्ति
  • व्यक्ति बनाम समाज
  • व्यक्ति बनाम परिस्थितियाँ
  • व्यक्ति का स्वयं से संघर्ष

संघर्ष के माध्यम से पात्रों के व्यक्तित्व और उनकी मानसिक स्थिति का विकास होता है।


8. घटनाओं का विकास

उपन्यास की घटनाएँ अचानक और असंबद्ध नहीं होनी चाहिए। घटनाओं का क्रम धीरे-धीरे विकसित होना चाहिए।

सामान्यतः कथा में—

आरंभ → विकास → संघर्ष → चरम स्थिति → समाधान

का क्रम दिखाई दे सकता है।

इस क्रम से उपन्यास में एकता और प्रभाव उत्पन्न होता है।


9. उद्देश्यपूर्ण चरम स्थिति

उपन्यास में ऐसी स्थिति आती है जहाँ कथा अपने सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुँचती है। इसे चरम स्थिति कहा जा सकता है।

यह स्थिति पाठक की जिज्ञासा को बढ़ाती है और आगे के परिणाम को जानने की उत्सुकता पैदा करती है।


10. जीवन की यथार्थता 🌍

श्रेष्ठ उपन्यास जीवन से जुड़ा होता है। उसमें समाज, परिवार, आर्थिक परिस्थितियों, मानवीय संबंधों और मानसिक भावनाओं का यथार्थ चित्रण होना चाहिए।

यथार्थता का अर्थ केवल समस्याओं का वर्णन करना नहीं है, बल्कि जीवन को उसके विभिन्न रूपों में स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत करना है।


उपन्यास के तत्वों का पारस्परिक संबंध 🔗

उपन्यास के सभी तत्व एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। केवल अच्छा कथानक पर्याप्त नहीं है। उसके साथ अच्छे पात्र, प्रभावशाली संवाद, उपयुक्त वातावरण, भाषा-शैली और उद्देश्य भी आवश्यक हैं।

इसे इस प्रकार समझ सकते हैं—

कथानक + पात्र + संवाद + देशकाल + वातावरण + भाषा-शैली + उद्देश्य + संघर्ष = सफल उपन्यास 📚✨


निष्कर्ष 🌺

अतः कहा जा सकता है कि हिन्दी उपन्यास एक व्यापक साहित्यिक विधा है, जिसमें मानव जीवन और समाज का विस्तृत चित्रण किया जाता है। कथानक, पात्र, चरित्र-चित्रण, संवाद, देशकाल, वातावरण, भाषा-शैली, उद्देश्य और संघर्ष इसके प्रमुख तत्व हैं।

इन सभी तत्वों का उचित और संतुलित प्रयोग उपन्यास को रोचक, प्रभावशाली, यथार्थपूर्ण और कलात्मक बनाता है। इसलिए किसी भी श्रेष्ठ उपन्यास की सफलता उसके विषय के साथ-साथ इन तत्वों के सुंदर समन्वय पर निर्भर करती है। 📖🌟

प्रश्न 3. ‘कफन’ कहानी की समीक्षा कीजिए। 📖

भूमिका

हिन्दी कथा-साहित्य में मुंशी प्रेमचन्द का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने भारतीय समाज के गरीब, शोषित और उपेक्षित वर्ग के जीवन को अपनी कहानियों में प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। ‘कफन’ प्रेमचन्द की प्रसिद्ध और चर्चित कहानियों में से एक है। यह कहानी गरीबी, सामाजिक विषमता, अमानवीयता और शोषण से उत्पन्न संवेदनहीनता का मार्मिक चित्रण करती है।

कहानी का सारांश

‘कफन’ कहानी के प्रमुख पात्र घीसू और माधव हैं। दोनों अत्यंत गरीब हैं और काम से बचने वाले तथा परिस्थितियों से टूटे हुए व्यक्ति हैं। माधव की पत्नी बुधिया प्रसव-वेदना से झोपड़ी के अंदर तड़प रही है, जबकि घीसू और माधव बाहर बैठे हुए हैं।

बुधिया की मृत्यु हो जाती है। गाँव के लोगों की सहायता से उसके अंतिम संस्कार के लिए पैसे इकट्ठे होते हैं। घीसू और माधव कफन खरीदने के लिए बाजार जाते हैं, लेकिन गरीबी और अपनी विकृत मानसिकता के कारण वे कफन खरीदने के बजाय उन पैसों से भोजन कर लेते हैं।

यह घटना कहानी को अत्यंत व्यंग्यपूर्ण और मार्मिक बना देती है।

1. गरीबी का यथार्थ चित्रण

कहानी में अत्यंत गरीब वर्ग की दयनीय स्थिति दिखाई गई है। घीसू और माधव की गरीबी केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि लगातार अभाव ने उनकी मानवीय संवेदनाओं को भी कमजोर कर दिया है।

2. सामाजिक विषमता

कहानी में समाज के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों और संपन्न वर्ग के बीच का अंतर स्पष्ट होता है। गरीब व्यक्ति के लिए जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ भी कठिन हो जाती हैं।

3. शोषण की समस्या

घीसू और माधव का चरित्र केवल उनकी व्यक्तिगत कमजोरी नहीं बताता, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था की ओर भी संकेत करता है जिसमें गरीब पीढ़ी-दर-पीढ़ी अभाव में जीता है।

4. मानवीय संवेदनाओं का ह्रास

‘कफन’ का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष संवेदनहीनता है। बुधिया की मृत्यु जैसी दुखद घटना के समय भी घीसू और माधव का व्यवहार सामान्य मानवीय संवेदना के अनुरूप नहीं दिखाई देता।

प्रेमचन्द पाठक के सामने यह प्रश्न रखते हैं कि क्या लगातार गरीबी और शोषण मनुष्य की संवेदनाओं को समाप्त कर सकते हैं?

5. घीसू और माधव का चरित्र-चित्रण

घीसू और माधव आलसी तथा कामचोर दिखाई देते हैं, लेकिन उनके चरित्र को केवल व्यक्तिगत दोषों के आधार पर देखना पर्याप्त नहीं है। उनके पीछे गरीबी, अभाव और सामाजिक उपेक्षा की लंबी कहानी है।

6. बुधिया का चरित्र

बुधिया कहानी में प्रत्यक्ष रूप से बहुत कम दिखाई देती है, लेकिन उसकी मृत्यु पूरी कहानी का केंद्र बन जाती है। वह गरीब स्त्री की उस स्थिति का प्रतिनिधित्व करती है जिसे समाज में पर्याप्त सुरक्षा और सम्मान नहीं मिलता।

7. शीर्षक की सार्थकता

कहानी का शीर्षक ‘कफन’ अत्यंत प्रतीकात्मक है। कफन मृत व्यक्ति के सम्मान और अंतिम संस्कार से जुड़ा होता है, लेकिन कहानी में कफन के लिए मिले पैसे का उपयोग भोजन के लिए किया जाता है।

इस प्रकार ‘कफन’ केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि गरीबी, सामाजिक विडंबना और मानवीय मूल्यों के संकट का प्रतीक बन जाता है।

8. भाषा-शैली

प्रेमचन्द की भाषा सरल, सहज और प्रभावशाली है। कहानी में व्यंग्य, संवाद और यथार्थवादी वर्णन का सुंदर प्रयोग हुआ है। संवाद पात्रों के स्वभाव को स्पष्ट करते हैं और कहानी को प्रभावशाली बनाते हैं।

निष्कर्ष 🌺

अतः ‘कफन’ केवल एक गरीब परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह गरीबी, शोषण, सामाजिक विषमता और मानवीय संवेदनाओं के ह्रास की गंभीर कहानी है। प्रेमचन्द ने घीसू और माधव के माध्यम से समाज की ऐसी व्यवस्था पर प्रश्न उठाया है जहाँ लगातार अभाव मनुष्य को संवेदनहीन बना सकता है।

इसी कारण ‘कफन’ हिन्दी की यथार्थवादी और सामाजिक चेतना से सम्पन्न श्रेष्ठ कहानियों में गिनी जाती है। 📚


प्रश्न 4. ‘अपना-अपना भाग्य’ कहानी के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए। 🎯

भूमिका

‘अपना-अपना भाग्य’ एक ऐसी कहानी है जिसमें लेखक ने सामाजिक विषमता, गरीबी, भाग्यवाद और मानवीय दृष्टिकोण की समस्या को सामने रखा है। कहानी के माध्यम से यह दिखाया गया है कि समाज में रहने वाले अलग-अलग वर्गों के लोगों के जीवन की परिस्थितियाँ कितनी भिन्न हो सकती हैं।

कहानी का उद्देश्य

इस कहानी का प्रमुख उद्देश्य केवल किसी घटना का वर्णन करना नहीं है, बल्कि समाज की असमान परिस्थितियों पर विचार करना है।

1. सामाजिक विषमता का चित्रण

समाज में कुछ लोगों के पास सुख-सुविधाओं की अधिकता है, जबकि कुछ लोग मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी संघर्ष करते हैं। कहानी इसी असमानता को उजागर करती है।

2. गरीबी की समस्या

गरीबी व्यक्ति के जीवन को अनेक प्रकार से प्रभावित करती है। गरीब व्यक्ति की इच्छाएँ और आवश्यकताएँ भी कई बार परिस्थितियों के सामने दब जाती हैं।

3. भाग्यवाद पर प्रश्न ❓

‘अपना-अपना भाग्य’ शीर्षक के माध्यम से भाग्य की धारणा सामने आती है। कहानी पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करती है कि क्या मनुष्य की परिस्थितियाँ केवल उसके भाग्य का परिणाम हैं या सामाजिक व्यवस्था और परिस्थितियाँ भी उसके जीवन को प्रभावित करती हैं।

4. मानवीय संवेदना

कहानी मनुष्य को दूसरे मनुष्य के दुःख को समझने और उसके प्रति संवेदनशील बनने का संदेश देती है।

5. सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्न

कहानी यह संकेत करती है कि समाज में मौजूद असमानताओं को केवल ‘भाग्य’ कहकर छोड़ देना उचित नहीं है। मनुष्य को सामाजिक अन्याय और विषमता को समझना चाहिए।


शीर्षक की सार्थकता 📖

‘अपना-अपना भाग्य’ कहानी के लिए अत्यंत सार्थक शीर्षक है।

  • कहानी में अलग-अलग लोगों की परिस्थितियाँ अलग हैं।
  • किसी को जीवन में सुख-सुविधाएँ मिलती हैं तो कोई अभाव में जीवन बिताता है।
  • पात्रों की परिस्थितियों के अंतर से ‘अपना-अपना भाग्य’ की भावना उभरती है।
  • शीर्षक कहानी के मूल सामाजिक प्रश्न को संक्षेप में व्यक्त करता है।
  • शीर्षक पाठक को यह सोचने पर मजबूर करता है कि असमानता को भाग्य मान लेना कहाँ तक उचित है।

निष्कर्ष 🌟

अतः ‘अपना-अपना भाग्य’ का उद्देश्य सामाजिक विषमता, गरीबी, भाग्यवाद तथा मानवीय संवेदना को सामने लाना है। कहानी का शीर्षक संक्षिप्त होते हुए भी कहानी के केंद्रीय भाव को व्यक्त करता है। इसलिए यह शीर्षक सार्थक, प्रतीकात्मक और प्रभावशाली है।


प्रश्न 5. प्रेमचन्दयुगीन कहानियों व कहानीकारों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। 📚

भूमिका

हिन्दी कहानी के विकास में प्रेमचन्द युग का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। प्रेमचन्द ने कहानी को मनोरंजन की सीमा से निकालकर समाज, व्यक्ति और जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा। इस काल में कहानी में सामाजिक यथार्थ, राष्ट्रीय चेतना, गरीबी, शोषण, ग्रामीण जीवन तथा मानवीय संवेदनाओं को प्रमुखता मिली।

प्रेमचन्दयुगीन कहानी की प्रमुख विशेषताएँ

1. सामाजिक यथार्थ

इस युग की कहानियों में समाज की वास्तविक समस्याओं का चित्रण हुआ।

2. ग्रामीण जीवन 🌾

किसान, मजदूर, ग्रामीण समाज और उनकी समस्याएँ कहानी का महत्वपूर्ण विषय बनीं।

3. गरीबी और शोषण

आर्थिक विषमता तथा शोषित वर्ग के जीवन को प्रमुखता मिली।

4. सामाजिक सुधार

बाल-विवाह, दहेज, जातिगत भेदभाव, अशिक्षा आदि समस्याओं पर कहानीकारों ने लिखा।

5. राष्ट्रीय चेतना 🇮🇳

देशप्रेम और स्वतंत्रता की भावना भी साहित्य में दिखाई दी।


प्रमुख कहानीकार

1. मुंशी प्रेमचन्द ✍️

प्रेमचन्द को हिन्दी कहानी का महान यथार्थवादी कहानीकार माना जाता है। उन्होंने किसान, मजदूर, गरीब, स्त्री तथा निम्न वर्ग के जीवन को अपनी कहानियों का विषय बनाया।

उनकी प्रमुख कहानियाँ हैं—

  • पूस की रात
  • ईदगाह
  • कफन
  • बड़े घर की बेटी
  • पंच परमेश्वर
  • ठाकुर का कुआँ
  • सद्गति

उनकी कहानियों में सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना प्रमुख हैं।

2. जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। उनकी कहानियों में भावुकता, मनोवैज्ञानिकता, ऐतिहासिक चेतना और मानवीय भावनाओं का सुंदर चित्रण मिलता है।

3. चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

गुलेरी जी हिन्दी कहानी के महत्वपूर्ण कहानीकार हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ हिन्दी कहानी की श्रेष्ठ रचनाओं में मानी जाती है। इसमें प्रेम, त्याग, कर्तव्य और बलिदान की भावना दिखाई देती है।

4. विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’

उन्होंने सामाजिक जीवन और मानवीय संबंधों से जुड़े विषयों पर कहानियाँ लिखीं। उनकी रचनाओं में सामाजिक समस्याओं का चित्रण मिलता है।

निष्कर्ष

प्रेमचन्द युग ने हिन्दी कहानी को सामाजिक सरोकार, यथार्थवाद और मानवीय संवेदना प्रदान की। इस युग के कहानीकारों ने साहित्य को आम जनता के जीवन से जोड़ा। हिन्दी कहानी के विकास में यह काल इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। 🌟


🔵 खण्ड–ख : लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. हिन्दी गद्य के विकास में पत्र-पत्रिकाओं के महत्व पर प्रकाश डालिए। 📰

हिन्दी गद्य के विकास में पत्र-पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन्होंने लेखकों और पाठकों के बीच एक प्रभावी माध्यम का कार्य किया।

प्रमुख महत्व

  1. पत्र-पत्रिकाओं ने हिन्दी गद्य को प्रचार और प्रसार का माध्यम दिया।
  2. नए लेखकों को अपनी रचनाएँ प्रकाशित करने का अवसर मिला।
  3. कहानी, निबंध, आलोचना और उपन्यास जैसी विधाओं के विकास में सहायता मिली।
  4. भाषा को अधिक सरल और व्यवस्थित बनाने में योगदान मिला।
  5. सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना के विकास में पत्र-पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
  6. पाठकों में साहित्य के प्रति रुचि उत्पन्न हुई।
  7. साहित्यिक बहस और आलोचना को मंच मिला।

निष्कर्ष: 📖
पत्र-पत्रिकाओं ने हिन्दी गद्य को जन-जन तक पहुँचाया और उसके विकास के लिए उपयुक्त साहित्यिक वातावरण तैयार किया।


प्रश्न 2. ‘उसने कहा था’ कहानी की सफलता को अपने शब्दों में व्यक्त करें। 🌟

‘उसने कहा था’ चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की प्रसिद्ध कहानी है। यह कहानी प्रेम, त्याग, कर्तव्य और बलिदान की भावना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है।

कहानी की सफलता के प्रमुख कारण हैं—

  • प्रभावशाली कथानक
  • सजीव चरित्र-चित्रण
  • स्वाभाविक संवाद
  • प्रेम और त्याग का सुंदर चित्रण
  • युद्ध की पृष्ठभूमि
  • भावनात्मक प्रभाव
  • भाषा की सरलता और प्रभावशीलता
  • कथा में कौतूहल और रोचकता

कहानी का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसमें व्यक्तिगत प्रेम को कर्तव्य और त्याग के साथ जोड़ा गया है। यही कारण है कि ‘उसने कहा था’ हिन्दी की महत्वपूर्ण कहानियों में स्थान रखती है। 📚


प्रश्न 3. आधुनिक कहानियों में व्यक्त सामाजिक परिवेश का उद्घाटन कीजिए। 🏠

आधुनिक हिन्दी कहानियों में समाज के बदलते हुए स्वरूप का यथार्थ चित्रण मिलता है। आधुनिक कहानीकारों ने व्यक्ति को उसके सामाजिक परिवेश से जोड़कर देखा है।

इन कहानियों में—

  • गरीबी और आर्थिक असमानता
  • बेरोजगारी
  • परिवार में बदलते संबंध
  • स्त्री की समस्याएँ
  • जातिगत भेदभाव
  • ग्रामीण और शहरी जीवन
  • अकेलापन और तनाव
  • आधुनिक जीवन की जटिलताएँ
  • सामाजिक रूढ़ियाँ

आदि विषय दिखाई देते हैं।

आधुनिक कहानी का सामाजिक परिवेश केवल बाहरी समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति की मानसिक और भावनात्मक स्थिति को भी सामने लाता है।

निष्कर्ष:
आधुनिक कहानियाँ बदलते समाज और बदलते मानवीय संबंधों का यथार्थ दस्तावेज प्रस्तुत करती हैं। 🌱


प्रश्न 4. हिन्दी गद्य के उद्भव व विकास के क्या कारण रहे? स्पष्ट कीजिए। ✍️

हिन्दी गद्य के उद्भव और विकास के पीछे अनेक सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक और साहित्यिक कारण रहे।

प्रमुख कारण

1. शिक्षा का प्रसार 📚
शिक्षा के विकास से पढ़ने-लिखने वालों की संख्या बढ़ी और गद्य की आवश्यकता महसूस हुई।

2. मुद्रण कला का विकास 📰
प्रेस और छपाई की सुविधा के कारण पुस्तकों तथा पत्र-पत्रिकाओं का तेजी से प्रकाशन होने लगा।

3. पत्र-पत्रिकाओं का प्रसार
पत्र-पत्रिकाओं ने हिन्दी गद्य को व्यापक पाठक वर्ग उपलब्ध कराया।

4. अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव
अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से निबंध, उपन्यास, कहानी आदि आधुनिक गद्य-विधाओं का प्रभाव हिन्दी पर पड़ा।

5. सामाजिक सुधार आंदोलन
समाज सुधार के लिए सरल और स्पष्ट भाषा की आवश्यकता थी, जिससे गद्य का विकास हुआ।

6. राष्ट्रीय चेतना 🇮🇳
राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान विचारों और संदेशों को जनता तक पहुँचाने के लिए गद्य प्रभावी माध्यम बना।

7. खड़ी बोली का विकास
खड़ी बोली हिन्दी के व्यवस्थित विकास से आधुनिक हिन्दी गद्य को मजबूत आधार मिला।

निष्कर्ष 🌺

इस प्रकार शिक्षा, मुद्रण कला, पत्र-पत्रिकाएँ, अंग्रेजी शिक्षा, सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय चेतना और खड़ी बोली के विकास ने हिन्दी गद्य के उद्भव एवं विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 5. प्रेमचन्दोत्तर उपन्यासकारों में से किन्हीं दो उपन्यासकारों का जीवनकाल व रचनाओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए। 📖

भूमिका

प्रेमचन्द के बाद हिन्दी उपन्यास साहित्य में अनेक महत्वपूर्ण उपन्यासकार सामने आए। इन लेखकों ने सामाजिक जीवन के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक, ग्रामीण, आर्थिक तथा मानवीय समस्याओं को भी उपन्यास का विषय बनाया। प्रेमचन्दोत्तर काल में हिन्दी उपन्यास की विषय-वस्तु और शिल्प दोनों में पर्याप्त विकास हुआ।

यहाँ दो प्रमुख उपन्यासकारों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है—

1. जैनेन्द्र कुमार 🌟

जैनेन्द्र कुमार हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यासकार, कहानीकार और निबंधकार थे। उनका जन्म 2 जनवरी 1905 को अलीगढ़ के कौड़ियागंज में हुआ और निधन 24 दिसंबर 1988 को हुआ।

जैनेन्द्र हिन्दी साहित्य में मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार के रूप में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उन्होंने बाहरी घटनाओं की अपेक्षा मनुष्य के अंतर्मन, मानसिक द्वंद्व, प्रेम, अहं और नैतिक संघर्ष को अधिक महत्व दिया।

प्रमुख रचनाएँ

  • त्यागपत्र
  • सुनीता
  • परख
  • कल्याणी
  • सुखदा
  • विवर्त

उनकी रचनाओं में व्यक्ति के मन की जटिलताओं का सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है। उनकी भाषा सरल, चिंतनपूर्ण और मनोवैज्ञानिक है।


2. यशपाल ✍️

यशपाल हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यासकार और कहानीकार थे। उनका जन्म 3 दिसम्बर 1903 को फिरोजपुर छावनी में हुआ और निधन 26 दिसम्बर 1976 को हुआ।

यशपाल का साहित्य सामाजिक और राजनीतिक चेतना से प्रभावित है। उन्होंने समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता, शोषण, रूढ़ियों, स्त्री-समस्याओं और राजनीतिक परिस्थितियों को अपनी रचनाओं में स्थान दिया।

प्रमुख उपन्यास

  • दादा कामरेड
  • देशद्रोही
  • दिव्या
  • पार्टी कामरेड
  • झूठा सच

‘झूठा सच’ उनका अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यास है, जिसमें भारत-विभाजन और उसके सामाजिक प्रभावों का प्रभावशाली चित्रण मिलता है।

निष्कर्ष 🌺

इस प्रकार जैनेन्द्र ने हिन्दी उपन्यास को मनोवैज्ञानिक गहराई प्रदान की, जबकि यशपाल ने उसे सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना से समृद्ध किया। दोनों का हिन्दी उपन्यास साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है।


प्रश्न 6. ‘कफन’ कहानी का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।📚

भूमिका

‘कफन’ मुंशी प्रेमचन्द की प्रसिद्ध कहानी है। इसमें लेखक ने गरीबी, सामाजिक विषमता, शोषण और मानवीय संवेदनाओं के संकट को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।

कहानी का उद्देश्य

1. गरीबी की भयावहता

कहानी का प्रमुख उद्देश्य गरीब वर्ग की दयनीय स्थिति को सामने लाना है। घीसू और माधव का जीवन लगातार अभाव और भूख से प्रभावित है।

2. सामाजिक विषमता ⚖️

समाज में आर्थिक रूप से संपन्न और गरीब वर्ग के बीच मौजूद गहरी खाई को प्रेमचन्द ने दिखाया है। गरीब व्यक्ति जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी संघर्ष करता है।

3. शोषण की व्यवस्था

घीसू और माधव की स्थिति यह संकेत करती है कि लंबे समय तक आर्थिक और सामाजिक शोषण व्यक्ति के जीवन को किस प्रकार प्रभावित करता है।

4. मानवीय संवेदना का ह्रास

बुधिया की मृत्यु जैसी दुखद परिस्थिति में भी घीसू और माधव का व्यवहार संवेदनहीन दिखाई देता है। प्रेमचन्द इसके माध्यम से बताते हैं कि अत्यधिक अभाव मनुष्य की संवेदनाओं को भी प्रभावित कर सकता है।

5. सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्न ❓

कहानी पाठक को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि केवल गरीब व्यक्ति को दोषी ठहराना पर्याप्त है या उस सामाजिक व्यवस्था को भी देखना चाहिए जिसने उसे ऐसी स्थिति में पहुँचाया।

6. रूढ़ियों पर व्यंग्य

कफन के लिए एकत्र किए गए धन का भोजन में खर्च हो जाना समाज की कुछ रूढ़ियों और बाहरी आडंबरों पर भी व्यंग्य करता है।

7. यथार्थ का चित्रण

प्रेमचन्द ने गरीबी और सामाजिक जीवन का आदर्शवादी नहीं बल्कि यथार्थवादी चित्रण किया है।

निष्कर्ष 🌟

अतः ‘कफन’ का उद्देश्य केवल घीसू, माधव और बुधिया की कहानी कहना नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य गरीबी, शोषण, सामाजिक विषमता और संवेदनहीनता के कारणों पर विचार करना है। यही कारण है कि ‘कफन’ आज भी पाठक को गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित करती है।


प्रश्न 7. प्रेमचन्द कृत कहानियों की विशेषताएँ लिखिए। ✍️📖

मुंशी प्रेमचन्द हिन्दी कहानी के महान कहानीकार माने जाते हैं। उन्होंने हिन्दी कहानी को समाज और सामान्य मनुष्य के जीवन से जोड़ा। उनकी कहानियों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1. यथार्थवाद 🌍

प्रेमचन्द की कहानियों में जीवन की वास्तविक परिस्थितियों का चित्रण मिलता है। वे समाज की समस्याओं को वास्तविक रूप में प्रस्तुत करते हैं।

2. ग्रामीण जीवन का चित्रण 🌾

किसान, मजदूर, ग्रामीण परिवार और गाँव की सामाजिक व्यवस्था उनकी कहानियों में प्रमुखता से दिखाई देती है।

3. गरीब और शोषित वर्ग

प्रेमचन्द ने गरीब, किसान, मजदूर तथा समाज के कमजोर वर्ग को अपनी कहानियों का महत्वपूर्ण विषय बनाया।

4. सामाजिक समस्याएँ

उनकी कहानियों में—

  • गरीबी
  • जातिगत भेदभाव
  • दहेज
  • अशिक्षा
  • शोषण
  • रूढ़ियाँ
  • आर्थिक विषमता

जैसी समस्याओं का चित्रण मिलता है।

5. मानवीय संवेदना ❤️

प्रेमचन्द के पात्रों के सुख-दुःख और संघर्ष को वे बड़ी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करते हैं।

6. आदर्श और यथार्थ का समन्वय

उनकी अनेक कहानियों में जीवन के यथार्थ के साथ नैतिक मूल्यों और आदर्शों की भावना भी दिखाई देती है।

7. सजीव चरित्र-चित्रण

प्रेमचन्द के पात्र सामान्य जीवन से लिए गए प्रतीत होते हैं। उनके व्यवहार और संवाद से उनका चरित्र स्पष्ट हो जाता है।

8. सरल एवं प्रभावशाली भाषा

उनकी भाषा सहज, सरल, बोलचाल के निकट और प्रभावशाली है। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ सामान्य पाठक को भी आसानी से समझ आती हैं।

9. संवादों की स्वाभाविकता 🗣️

प्रेमचन्द के संवाद पात्रों के स्वभाव के अनुरूप होते हैं और कथा को आगे बढ़ाने में सहायक होते हैं।

10. उद्देश्यपूर्ण साहित्य

उनकी कहानियों में मनोरंजन के साथ सामाजिक जागरण और मानवीय मूल्यों की स्थापना का उद्देश्य भी मिलता है।

प्रमुख कहानियाँ

‘ईदगाह’, ‘पूस की रात’, ‘कफन’, ‘सद्गति’, ‘ठाकुर का कुआँ’, ‘पंच परमेश्वर’ आदि उनकी प्रसिद्ध कहानियाँ हैं।

निष्कर्ष 🌺

इस प्रकार प्रेमचन्द की कहानियाँ यथार्थवाद, सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना, ग्रामीण जीवन और सरल भाषा के कारण हिन्दी कहानी साहित्य में विशेष स्थान रखती हैं। उन्होंने कहानी को आम आदमी के जीवन से जोड़कर उसे नई दिशा प्रदान की।


प्रश्न 8. ‘अपना-अपना भाग्य’ कहानी की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।📖

भूमिका

‘अपना-अपना भाग्य’ प्रसिद्ध हिन्दी कथाकार जैनेन्द्र कुमार की महत्वपूर्ण कहानी है। यह कहानी एक गरीब पहाड़ी बालक के माध्यम से गरीबी, बाल-श्रम, सामाजिक विषमता और मध्यवर्गीय संवेदनहीनता को सामने लाती है। उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री भी कहानी में मानवीय मूल्यों के ह्रास और मध्यवर्गीय पाखंड को प्रमुख विषयों के रूप में रेखांकित करती है।

कथावस्तु

कहानी का आरंभ नैनीताल के प्राकृतिक वातावरण से होता है। लेखक अपने मित्र के साथ वहाँ घूम रहा होता है। इसी दौरान उनकी मुलाकात एक गरीब पहाड़ी बालक से होती है। वह बालक ठंड से काँप रहा होता है और भूख से परेशान है।

बातचीत से पता चलता है कि वह गरीबी के कारण अपने घर से निकल आया है। वह काम की तलाश में है और किसी भी प्रकार का छोटा-मोटा काम करके भोजन प्राप्त करना चाहता है। उसके जीवन में न तो पर्याप्त भोजन है और न ही ठंड से बचने के लिए उचित कपड़े।

लेखक और उसका मित्र उसकी स्थिति देखकर उसके प्रति सहानुभूति अनुभव करते हैं। वे उसे काम दिलाने की कोशिश करते हैं और एक वकील मित्र के पास ले जाते हैं। लेकिन वहाँ भी बालक के प्रति पूरी तरह विश्वास नहीं किया जाता।

इसके बाद लेखक और उसके मित्र के सामने बालक की सहायता करने का अवसर आता है। उनके पास पैसे तो होते हैं, लेकिन वे अपनी सुविधाओं और बजट का विचार करते हुए उसे पर्याप्त सहायता नहीं दे पाते। इस प्रकार उनकी सहानुभूति केवल बातों तक सीमित रह जाती है।

अगले दिन उस बालक की मृत्यु का समाचार मिलता है। कड़ाके की ठंड और अभाव के कारण वह जीवित नहीं बच पाता। उसकी मृत्यु के बाद लेखक और उसके मित्र की प्रतिक्रिया में ‘अपना-अपना भाग्य’ जैसी भावना सामने आती है।

यहीं कहानी का सबसे तीखा व्यंग्य है—जिस बालक की सहायता की जा सकती थी, उसकी मृत्यु को भाग्य कहकर लोग अपनी जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। कहानी भाग्यवाद के सहारे सामाजिक जिम्मेदारी से बचने की मानसिकता पर प्रश्न उठाती है।

कहानी का मुख्य संदेश 🎯

इस कहानी के माध्यम से जैनेन्द्र कुमार बताते हैं कि गरीब की स्थिति को केवल ‘उसका भाग्य’ कह देना उचित नहीं है। समाज में प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह जरूरतमंद के प्रति संवेदनशील हो।

निष्कर्ष 🌟

‘अपना-अपना भाग्य’ की कथावस्तु सरल होते हुए भी अत्यंत मार्मिक और विचारोत्तेजक है। एक गरीब बालक की दुखद स्थिति के माध्यम से लेखक ने गरीबी, सामाजिक असमानता, बाल-श्रम, स्वार्थ और दिखावटी सहानुभूति पर गहरा व्यंग्य किया है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी विशेषता है। 📚✨

 

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